Friday, January 17, 2020

सीएए विरोध का खतरनाक रूप: झूठ के सहारे सीएए का विरोध संवैधानिक और सांस्कृतिक धरातल पर खतरनाक तो है ही, अनैतिक भी है

- प्रो. निरंजन कुमार, दैनिक जागरण 

नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए दस जनवरी से देशभर में लागू कर दिया गया। इसके बावजूद इस कानून का विरोध राजनीतिक दायरे से बाहर निकलकर संवैधानिक और धार्मिक-सांस्कृतिक धरातल पर भी होने लगा है। केरल की विधानसभा द्वारा इस कानून को रद करने का प्रस्ताव पारित करना अथवा विरोध प्रदर्शन के दौरान फैज अहमद फैज की मजहबी प्रतीकों वाली नज्म हम देखेंगे गाया जाना, फ्री कश्मीर के पोस्टर लहराना और हंिदूू विरोधी उत्तेजक धार्मिक नारे लगाया जाना इसी की बानगी है। झूठ के सहारे सीएए का विरोध संवैधानिक और सांस्कृतिक धरातल पर खतरनाक तो है ही, राजनीतिक रूप से भी अनैतिक है। केरल विधानसभा द्वारा सीएए कानून को रद करने का प्रस्ताव अभूतपूर्व और संविधान का पूरी तरह से उल्लंघन है। अब तो केरल सरकार सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गई है। भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्यों और संघ के मध्य विषयों/अधिकारों के बंटवारे का उल्लेख है। राष्ट्रीय महत्व से संबंधित विषयों को संघ सूची में रखा गया है, जिन पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है। नागरिकता या जनगणना जैसे विषय संघ सूची में ही हैं। संविधान में उल्लिखित अनुच्छेद 245 से 255 का सार यही है कि संसद द्वारा बनाए गए कानून का अनुपालन प्रत्येक राज्य को करना ही पड़ेगा। इसे न मानने का अर्थ है संविधान का उल्लंघन। केरल विधानसभा ने इस संवैधानिक लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया। वहां के मुख्यमंत्री विभिन्न राज्यों को इस कानून के विरोध के लिए उकसा रहे हैं। इससे तो हमारे संविधान का ढांचा ही चरमरा उठेगा। सीएए विरोधियों का यह तर्क नितांत गलत है कि सीएए अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। कई विधि विशेषज्ञ यह कह चुके हैं कि ऐसा कुछ नहीं है।

सीएए विरोध में धीरे-धीरे मजहबी और ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल हो रहा है जो विवादास्पद हैं। नज्म हम देखेंगे के समर्थकों का दावा है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है और फैज ने पाकिस्तान में जनरल जियाउल हक की तानाशाही के खिलाफ इसे लिखा था, लेकिन जिन फैज को क्रांतिकारी, पंथनिरपेक्ष और मानवतावादी बताया जा रहा है उन्होंने 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा बांग्लादेश में लाखों लोगों के नरसंहार पर चुप्पी साध ली थी, क्योंकि वह जुल्फिकार अली भुट्टो के समर्थक थे।

सांस्कृतिक प्रतीक देश और काल के सापेक्ष होते हैं और उसी परिप्रेक्ष्य में लोग इसका अर्थ ग्रहण करते हैं। मिसाल के लिए इंग्लैंड आदि देशों में उल्लू बुद्धिमानी का प्रतीक है। क्या हम भारत में भी किसी को उल्लू कह सकते हैं और यह तर्क दे सकते हैं कि वह तो उसकी तारीफ कर रहे थे? फैज की नज्म तानाशाही वाले इस्लामी मुल्कों में ही ठीक है। पाकिस्तान जैसे मुल्कों में जहां इस्लाम राजधर्म है वहां मजहबी प्रतीकों से लबरेज यह नज्म प्रतिरोध के रूप में, शायद गलत नहीं हो, पर भारत जैसे पंथनिरपेक्ष देश में इस तरह के मजहबी प्रतीक गलतफहमियां पैदा करेंगे। पाकिस्तान में इस्लाम का जो कट्टर रूप मौजूद है वह किसी भी दूसरे पंथ-पूजा को बर्दाश्त नहीं कर पाता। भगवान बुद्ध की अफगानिस्तान के बामयान में स्थित चौथी-पांचवीं शताब्दी में बनी प्रतिमाओं को कट्टरपंथी मुसलमानों ने टैंक लगाकर इसलिए उड़ा दिया था कि इस्लाम में बुत या मूर्ति के लिए कोई जगह नहीं है और अल्लाह ही एकमात्र ईश्वर है। पाकिस्तान में आए दिन मंदिर तोड़े जाने और धमार्ंतरण आदि की घटनाएं घटती रहती हैं।

सीएए विरोध का एक आयाम राजनीतिक भी है। सीएए के बहाने मोदी सरकार पर निशाना लगाने का विपक्षी राजनीतिक दलों को जैसे मौका मिल गया है। गहराई से देखें तो कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, टीएमसी, सपा, बसपा, आप, राजद आदि दलों और उनके नेताओं को मुस्लिम वोटों को गोलबंद करने का एक सुनहरा अवसर दिख रहा है। मुसलमानों को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए इन राजनीतिक दलों में एक कंपटीटिव पॉलिटिक्स चल रही है। मुस्लिम समुदाय को समझना चाहिए कि सीएए से भारतीय मुसलमानों के किसी भी अधिकार या नागरिकता पर कोई आंच नहीं आने वाली। यह तो कुछ लोगों को नागरिकता देने का कानून है, किसी की नागरिकता लेने का नहीं। विपक्षी दल मुसलमानों का भला की जगह बुरा ही कर रहे हैं। वैसे भी मुसलमानों के असली मुद्दे तो इन दलों की चिंता का विषय शायद ही कभी होते हैं। मुस्लिम समुदाय को अपने राजनीतिक इस्तेमाल के प्रति सचेत होना चाहिए।

पूरे प्रकरण में एक अन्य खतरनाक बात यह है कि मुसलमानों को डराने के लिए मीडिया का एक वर्ग और तथाकथित बुद्धिजीवी किसी भी अतिवाद तक जाने को तैयार हैं। दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में सीएए के विरोध में कुछ लोग एक माह से सड़क पर कब्जा जमाए बैठे हैं। इसके कारण हर दिन लाखों लोग परेशान हो रहे हैं, लेकिन विपक्षी दलों और मीडिया का एक हिस्सा इसकी अनदेखी करने में लगा हुआ है। नि:संदेह ये भी अच्छे संकेत नहीं कि विरोध प्रदर्शनों में फ्री कश्मीर के पोस्टर लहराए जा रहे हैं। सीएए का विरोध नैतिक रूप से भी गलत है। सीएए में इस्लामी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मजहबी आधार पर उत्पीड़ित छह धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात है। इन लोगों की वहां क्या हालत है, इसका अंदाजा वहां उनकी तेजी से घटती जनसंख्या से लगा सकते हैं। यह अनायास नहीं कि महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल से लेकर मनमोहन सिंह, अशोक गहलोत, प्रकाश करात अथवा ममता बनर्जी आदि ने पूर्व में मजहबी आधार पर उत्पीड़ितों को भारत में शरण देने की पुरजोर वकालत की थी। छल-प्रपंच का सहारा लेकर सीएए का विरोध एक खतरनाक सियासत है। इसके भयानक दुष्परिणाम हो सकते हैं।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)


दिल्ली : सरकारी अस्पतालों की बुरी हालत; बन रहे अस्पताल नहीं हो सके तैयार; ऊपर से पानी की कमी: राज्य सरकार जिम्मेदार

राजधानी में ढांचागत विकास के क्षेत्र में तेजी से काम किए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। यहां आज भी एक बड़ी आबादी पानी की समस्या से जूझ रही है। इसका फायदा टैंकर माफिया उठाते हैं। वहीं बात अगर स्वास्थ्य सेवाओं की करें तो जनसंख्या के लिहाज से न अस्पताल मौजूद हैं और न ही बेड हैं। स्थिति यह है कि अक्सर मरीजों को बेड शेयर करना पड़ जाता है। ऐसे में राजधानी में नए अस्पतालों का निर्माण कराने व जलशोधन यंत्र लगाने पर सरकार को गंभीरता से काम करना होगा।

अधूरे पड़े काम

ढांचागत विकास आगे नहीं बढ़ पाया है, जिन अस्पतालों का निर्माण कार्य चल रहा था। वह भी पूरा नहीं हो सका है। नए अस्पतालों का भी काम शुरू नहीं हो सका है। दिल्ली में इस समय 20 हजार बेड की कमी है। इसके लिए अस्पतालों का ढांचा खड़ा करना होगा। अन्यथा दिल्ली की जनता को बड़ी परेशानी होगी। दिल्ली की जनता आज भी एक-एक बेड पर दो मरीजों के हिसाब से भर्ती होने को मजबूर है। हालांकि, दिल्ली सरकार ने अंतिम वर्ष में अस्पतालों के री-मॉडल (पुनर्विकसित) करने की योजनाओं पर आठ अस्पतालों में काम शुरू किया था। चार अन्य अस्पतालों के निर्माण की टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई है। इतना ही नहीं तीन नए अस्पतालों की योजना को खर्च एवं वित्त समिति से मंजूरी मिल गई है। मगर सवाल यही है कि यदि काम पहले शुरू हो पाते तो अब तक यह योजनाएं पूरी हो चुकी होतीं।

द्वारका अस्पताल भी नहीं हो सका तैयार

दक्षिणी-पश्चिम दिल्ली के द्वारका में निर्माणाधीन 1241 बेड वाले इंदिरा गांधी सुपर मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल पर पिछले पांच साल से काम चल रहा है। 85 प्रतिशत निर्माण कार्य अब तक पूरा हो सका है। इसके न बन पाने से द्वारका, मधु विहार, राजनगर व पालम कॉलोनी आदि इलाकों के लाखों लोगों के लिए इस क्षेत्र में कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। वर्तमान में द्वारका से 9 किलोमीटर की दूरी पर जनकपुरी में सरकारी अस्पताल है। जिससे लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

नहीं बन सका बुराड़ी अस्पताल 

बुराड़ी में निर्माणाधीन 772 बेड के अस्पताल का निर्माण कार्य भी दिल्ली सरकार पूरा नहीं करा सकी है। बुराड़ी में बनने वाले 200 बिस्तर वाले अस्पताल की क्षमता को बढ़ाकर 772 बिस्तर करने की घोषणा करते हुए योजना का शिलान्यास किया गया था। पूर्व की योजना के तहत अगस्त 2015 में ही 200 बिस्तर की क्षमता वाले अस्पताल का निर्माण कार्य पूरा करने का लक्ष्य तय था। लेकिन इसके बाद इसमें बिस्तर हालांकि, इस अस्पताल की योजना की नींव 8 अक्तूबर 2008 को ही रख दी गई थी। उस समय कांग्रेस की सरकार थी तब यह योजना 100 बिस्तर की थी। 

250 एमजीडी पानी और मिले तब बने बात 

पानी के मामले में सुधार के बावजूद अभी करीब 250 एमजीडी पानी प्रतिदिन की कमी है। इससे राजधानी की एक बड़ी आबादी को पानी की समस्या का सामना करना पड़ता है। गर्मी के दिनों में यह समस्या और अधिक बढ़ जाती है। ऐसे में आने वाले समय में पानी के क्षेत्र में ढांचागत विकास के मामले में तेजी से काम करना होगा। ताकि, टैंकर माफिया का नेटवर्क तोड़ा जा सके और गंदे पानी की समस्या से भी लोगों को निजात मिल सके। पिछले कुछ दिनों से गंदे पानी की आपूर्ति को लेकर दिल्ली सरकार कटघरे में है। 

विपक्ष का कहना है:

मुकेश शर्मा, मुख्य प्रवक्तादिल्ली कांग्रेस:

"केजरीवाल सरकार ने विज्ञापनों में ही विकास कार्य कराए हैं। सही मायने में पांच साल में विकास कार्य ठप हुए हैं। दिल्ली सरकार पहले केंद्र सरकार के साथ लड़ती रही। आधा समय इस सरकार ने ऐसे ही गुजार दिया। बाद के समय में भी काम नहीं हुआ। सरकार सिर्फ आंकड़े गिनाती है। आज भी दिल्ली में ग्रामीण इलाकों में बिजली का बुरा हाल है। टैंकर माफिया का दिल्ली में कब्जा है। पानी की पाइपलाइनें कागजों में ही पड़ी हैं। जहां लाइनें पड़ीं उनमें पानी नहीं आता है। अस्पतालों में एक बेड पर दो-दो मरीज भर्ती होते हैं।" (जागरण से साभार)

हरीश खुराना, प्रवक्ता दिल्ली भाजपा:

"ढांचागत विकास के मामले में यह सरकार फेल रही है। शीला सरकार के समय भी बिजली कंपनियों की चांदी थी, उस समय 6 सौ करोड़ की सब्सिडी इन कंपनियों को दी जा रही थी। यही केजरीवाल और उनकी सरकार में बैठे लोग तब शीला सरकार को चोर कहते थे। अब यही केजरीवाल सरकार बिजली कंपनियों को 18 सौ करोड़ की सब्सिडी दे रही है। पानी के क्षेत्र में भी यही स्थिति है। जनता को जहरीला पानी पिलाया जा रहा है। केजरीवाल सरकार फर्जी आंकड़े दिखाने में माहिर है। नीति आयोग ने सरकारों के कार्य का आकलन करते हुए एक में बढ़त दिखाई तो पीठ ठोक रहे हैं और जिसमें फिसड्डी रहे, उसे नहीं बता रहे। न ही स्कूल सुधरे हैं और न ही अस्पताल बन पाए हैं। " (जागरण से साभार)

दिल्ली: सीलिंग के लिए जिम्मेदार आप सरकार; वहीँ भाजपा व्यापारी हित में

दिल्ली में सीलिंग से व्यापारियों को बहुत उठाना पड़ा। पर एक बात साफ़ है: आप सरकार की वजह से सीलिंग हुई थी।

आप सरकार की वजह से दिल्ली में पिछले तीन वर्षों से सीलिंग का भय बना रहा है। दिल्ली सरकार ने 351 सड़कों को अधिसूचित नहीं करने और व्यापारियों के लंबित मामलों का जवाब नहीं देने के कारण सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मॉनिटरिंग कमेटी ने कार्रवाई की। 

आप सरकार ने बिना वैकल्पिक स्थान दिए दिल्ली में 52 हजार छोटी फैक्ट्रियों को सील करने के लिए नगर निगमों पर दबाव बनाया।

वहीं, दूसरी ओर केंद्र सरकार ने सीलिंग रुकवाने के लिए हरसंभव प्रयास किया है। दिल्ली विकास प्राधिकरण से नियमों में बदलाव करके व्यापारियों को राहत पहुंचाई गई।

केंद्र सरकार व नगर निगमों के साथ ही जब दिल्ली में भी भाजपा की सरकार होगी तो सीलिंग को पूरी तरह रोकने में मदद मिलेगी। आशा है दिल्ली के मतदाता यह बात समझ कर वोट करेंगे। 

दिल्ली : शाहीन बाग में धरना और निकम्मी आप सरकार


दिल्ली के शाहीन बाग में धरना चल रहा है. आआपा. संचालित राज्य सरकार उसे रोकने और लोगों को घर वापस भेजने की कोई कोशिश करती नहीं दीखती. क्या कानून-व्यवस्था सिर्फ केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है? 

विश्वास नहीं होता देश की राजधानी में ऐसी निकम्मी और गैर जिम्मेदाराना सरकार चल रही है


Thursday, January 16, 2020

दिल्ली: भाजपा को सदस्यता अभियान और आँकड़ों से जीत का भरोसा

करीब 30 साल से देश की राजधानी की सत्ता से दूर भाजपा के लिए इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव उसके सदस्यता अभियान और उनके आंकड़ों की भी कसौटी होगा। इसका आंकड़ा बड़ा दिलचस्प है। दिल्ली में अभी एक करोड़ 46 लाख वोटर हैं। भाजपा का राजधानी में सदस्यता अभियान खत्म होने के बाद अभी उसके 62 लाख 28 हजार 172 सदस्य हैं। यानी कुल वोटरों के 42.4% भाजपा सदस्य हैं। 

2015 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 48 लाख 78 हजार 397 वोट पाकर 67 सीटें जीत ली थीं। इस लिहाज से देखा जाए तो भाजपा के सदस्य ही उसे वोट दे दें तो वह सभी 70 सीटें हासिल कर सकती है। 

हालांकि, 2015 में भी ऐसा नहीं हुआ था। 2015 के चुनाव में भी भाजपा के सभी सदस्यों ने पार्टी को वोट नहीं किया था। भाजपा ने 2015 में 44 लाख 45 हजार 172 सदस्य बनाए थे। लेकिन उसे विधानसभा के चुनाव में महज 28 लाख 90 हजार 485 (32.19%) वोट ही मिल पाए थे। 

पर 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वापसी की और 49 लाख 85 हजार 541 (56.86%) वोट हासिल कर सभी 7 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। 

हालांकि दिल्ली कम वोटिंग प्रतिशत के लिए भी जानी जाती है। दिल्ली में 2019 के लोकसभा चुनाव में 60.59% वोट पड़े थे, जबकि 2015 के विधानसभा चुनाव में 67.12% वोटिंग हुई थी।